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उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में POCSO स्पेशल कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 33 नाबालिग बच्चों के यौन शोषण के दोषी इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है। अदालत ने इस अपराध को “मानवता को झकझोर देने वाला” बताते हुए कड़ी से कड़ी सजा दी। साथ ही कोर्ट ने प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।

यह मामला वर्ष 2023 में सामने आया था, जब कुछ अभिभावकों ने अपने बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव और मानसिक तनाव को महसूस किया। शक के आधार पर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। जांच के दौरान चौंकाने वाले खुलासे हुए। पुलिस को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फॉरेंसिक जांच में ऐसे डिजिटल साक्ष्य मिले, जिनसे पता चला कि आरोपी बच्चों के साथ गलत कृत्य कर उसकी रिकॉर्डिंग करते थे और उसे डार्क वेब के माध्यम से बेचते थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्परता से कार्रवाई की और दंपति को गिरफ्तार कर लिया। जांच एजेंसियों ने साइबर विशेषज्ञों की मदद से डिजिटल डेटा जुटाया। बच्चों के बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए और उन्हें काउंसलिंग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई गई।

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने ठोस सबूत और गवाह पेश किए। अदालत ने माना कि आरोपियों ने विश्वास का दुरुपयोग करते हुए बेहद जघन्य अपराध किया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के अपराध समाज की नींव को हिला देते हैं और दोषियों को कड़ी सजा देना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसा अपराध करने वालों को कड़ा संदेश मिले।

विशेष POCSO न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दोष सिद्ध होने पर दोनों को मृत्युदंड सुनाया। इसके अलावा कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि प्रत्येक पीड़ित को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जाए, ताकि उनके पुनर्वास और भविष्य की शिक्षा में मदद मिल सके।

फैसले के बाद सरकारी वकील ने इसे न्याय की बड़ी जीत बताया। वहीं सामाजिक संगठनों ने भी अदालत के निर्णय का स्वागत किया और कहा कि इससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर सख्त संदेश जाएगा।

यह फैसला न केवल बांदा बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। यह निर्णय पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है और समाज को यह संदेश देता है कि कानून बच्चों की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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