Wed. Feb 4th, 2026

नासिक में गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान विवाद, महिला कर्मचारी ने मंत्री के भाषण का किया खुला विरोध
महाराष्ट्र के नासिक स्थित पुलिस परेड ग्राउंड में आयोजित मुख्य सरकारी गणतंत्र दिवस समारोह उस समय विवादों में घिर गया, जब वन विभाग की महिला कर्मचारी माधुरी जाधव ने मंच से भाषण दे रहे ग्राम विकास मंत्री एवं जिले के गार्जियन मिनिस्टर गिरीश महाजन का खुला विरोध कर दिया। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से पूरे समारोह में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया और कार्यक्रम की गरिमा पर भी सवाल खड़े हो गए।
दरअसल, 26 जनवरी के अवसर पर नासिक पुलिस परेड ग्राउंड में राज्य स्तरीय सरकारी समारोह का आयोजन किया गया था। समारोह में ध्वजारोहण के बाद गार्जियन मिनिस्टर गिरीश महाजन बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे। अपने भाषण में मंत्री ने देश की आज़ादी, लोकतंत्र, विकास योजनाओं और सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख किया, लेकिन आरोप है कि उन्होंने संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का नाम नहीं लिया। इसी बात से आहत होकर वन विभाग की महिला कर्मचारी माधुरी जाधव ने मंच के सामने से ही मंत्री के भाषण का विरोध शुरू कर दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही मंत्री का भाषण समाप्ति की ओर बढ़ा, माधुरी जाधव ने जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर दिए। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के सम्मान में नारे लगाए और यह सवाल उठाया कि संविधान दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर संविधान निर्माता का नाम लेना क्यों जरूरी नहीं समझा गया। अचानक हुए इस विरोध से कुछ देर के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी सतर्क हो गई और अधिकारियों ने स्थिति को संभालने की कोशिश की।
हालांकि, अधिकारियों की समझाइश के बाद स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में आ गई और कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया, लेकिन इस घटना की चर्चा पूरे समारोह के दौरान होती रही। बाद में, मीडिया से बातचीत में माधुरी जाधव ने अपने विरोध का कारण स्पष्ट करते हुए कहा कि गार्जियन मिनिस्टर ने अपने संबोधन में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का नाम नहीं लिया, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा, “जिस व्यक्ति ने हमें संविधान दिया, जिसने लोकतंत्र की नींव रखी, उसका नाम न लेना बहुत बड़ी गलती है। गणतंत्र दिवस केवल औपचारिक उत्सव नहीं है, बल्कि संविधान और उसके मूल्यों को याद करने का दिन है।”
माधुरी जाधव ने यह भी कहा कि वह अपने कदम पर पूरी तरह से कायम हैं और किसी भी संभावित कार्रवाई से डरती नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मुझे सस्पेंड किया जा सकता है, मेरे खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती है, लेकिन मैं माफी नहीं मांगूंगी। मैंने जो कहा, वह सच के लिए कहा। अगर सच बोलने की सजा मिलती है, तो मैं उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हूं।” उनके इस बयान के बाद मामला और अधिक राजनीतिक व सामाजिक बहस का विषय बन गया।
इस घटना के बाद सामाजिक संगठनों और विभिन्न दलित संगठनों ने भी प्रतिक्रिया दी। कई संगठनों ने माधुरी जाधव के समर्थन में बयान जारी करते हुए कहा कि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का योगदान केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र की नींव उन्हीं के विचारों पर टिकी हुई है। ऐसे में गणतंत्र दिवस के अवसर पर उनका नाम न लिया जाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण, बल्कि संविधान की भावना के भी खिलाफ है।
वहीं, दूसरी ओर कुछ लोगों ने इस विरोध के तरीके पर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि सरकारी समारोह के दौरान इस तरह का विरोध कार्यक्रम की मर्यादा के खिलाफ है और यदि कोई आपत्ति थी तो उसे उचित मंच और माध्यम से उठाया जाना चाहिए था। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, पूरे मामले की रिपोर्ट तैयार की जा रही है और उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
राजनीतिक गलियारों में भी इस घटना को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्षी दलों ने मंत्री के भाषण पर सवाल उठाते हुए कहा कि संविधान निर्माता को भूल जाना किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए शोभनीय नहीं है। उन्होंने सरकार से इस मामले पर स्पष्टीकरण देने और भविष्य में ऐसे आयोजनों में संवैधानिक मूल्यों का पूरा सम्मान सुनिश्चित करने की मांग की है।
हालांकि, मंत्री गिरीश महाजन की ओर से इस मामले में कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सूत्रों के मुताबिक, मंत्री समर्थकों का कहना है कि भाषण में किसी नाम का उल्लेख न होना जानबूझकर नहीं था और इसका गलत अर्थ निकाला जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों और संविधान के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
कुल मिलाकर, नासिक के गणतंत्र दिवस समारोह में हुआ यह विवाद अब केवल एक सरकारी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संविधान, उसके मूल्यों और सार्वजनिक मंचों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी व्यापक बहस का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या इस घटना से सरकारी आयोजनों में संवैधानिक चेतना को और मजबूत करने की कोई पहल होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *