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महा बोधि आन्दोलन में उमड़ा जनसैलाब, जंतर-मंतर पर गूंजे जय भीम जय संविधान नमो बुद्ध के नारे

नई दिल्ली। 12 फरवरी को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित महाबोधि मुक्ति आन्दोलन में भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा। देश के विभिन्न हिस्सों से आए बौद्ध अनुयायियों, भिक्षुओं और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर अपनी मांगों को बुलंद आवाज दी। आंदोलन का नेतृत्व भंते विनयचार्य ने किया।

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में देश के 28 राज्यों से बौद्ध धर्म के अनुयायी शामिल हुए। साथ ही विदेशों से भी कई बौद्ध भिक्षु और अनुयायी जंतर-मंतर पहुंचे। शांतिपूर्ण और अनुशासित ढंग से आयोजित इस आंदोलन में सामाजिक न्याय, धार्मिक अधिकारों और महाबोधि से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया।

सभा को संबोधित करते हुए चंद्रशेखर आजाद, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आजाद समाज पार्टी एवं सांसद (नगीना) ने कहा कि देश में समानता और धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि बौद्ध समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह आंदोलन सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कार्यक्रम के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता मंजीत सिंह नौटियाल ने कहा कि यह केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई है। उन्होंने युवाओं से जागरूक होकर समाज सुधार में भागीदारी निभाने का आह्वान किया।

वहीं युवा शक्ति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि गौतम ने अपने संबोधन में कहा कि देश का युवा वर्ग अब अपने अधिकारों के प्रति सजग है और अन्याय के खिलाफ संगठित हो रहा है। उन्होंने कहा कि महाबोधि मुक्ति आंदोलन ने पूरे देश के युवाओं को एक मंच पर लाने का कार्य किया है।

सभा को संबोधित करते हुए उपकर बाबर, नेता, बहुजन समाज पार्टी ने कहा कि बहुजन समाज हमेशा से सामाजिक न्याय और समान अधिकारों की लड़ाई लड़ता रहा है। उन्होंने आंदोलन को लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में आगे बढ़ाने की बात कही।

इसके अलावा राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि बौद्ध समाज की एकजुटता ने यह संदेश दिया है कि अब अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन आने वाले समय में व्यापक सामाजिक बदलाव का आधार बनेगा।

पूरे कार्यक्रम के दौरान जंतर-मंतर पर “जय भीम” और “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” के नारों से वातावरण गूंजता रहा। पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

आयोजकों का कहना है कि यदि मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। महाबोधि मुक्ति आंदोलन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि जब समाज संगठित होता है, तो उसकी आवाज दूर तक पहुंचती है

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