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योनि के ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं” — छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला
बिलासपुर, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी मामले में आरोपित द्वारा महिला की योनि के ऊपर लिंग रखकर वीर्यपात करने का आरोप हो, लेकिन वास्तविक प्रवेश (पेनिट्रेशन) सिद्ध न हो, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत बलात्कार की श्रेणी में नहीं माना जा सकता। यह निर्णय न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने सुनाया।
मामला एक आपराधिक अपील से संबंधित था, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी को बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराया था। आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों में वास्तविक प्रवेश का प्रमाण नहीं है। बचाव पक्ष का तर्क था कि मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता के बयान में स्पष्ट पेनिट्रेशन का उल्लेख नहीं है।
न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और भारतीय दंड संहिता की धारा 375 की परिभाषा का विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि बलात्कार के अपराध के लिए “प्रवेश” (penetration) का होना आवश्यक तत्व है, चाहे वह आंशिक ही क्यों न हो। यदि केवल बाहरी स्पर्श या योनि के ऊपर वीर्यपात हुआ हो और प्रवेश सिद्ध न हो, तो धारा 376 के तहत अपराध स्थापित नहीं होता।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की हरकत को गंभीर अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं माना जा सकता। यदि परिस्थितियां और साक्ष्य अन्य यौन अपराधों की ओर संकेत करते हैं, तो संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए आरोपी को बलात्कार के आरोप से बरी कर दिया, लेकिन अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत दोषसिद्धि पर विचार बनाए रखा।
इस फैसले के बाद कानूनी हलकों में बहस शुरू हो गई है। कुछ विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय कानून की शाब्दिक व्याख्या पर आधारित है, जबकि अन्य का कहना है कि ऐसे मामलों में व्यापक सामाजिक संदर्भ को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
