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राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसी भावुक और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे देश का दिल छू लिया। यह कहानी है शौर्य, सम्मान और वचन निभाने की — और यह कहानी जुड़ी है शौर्य चक्र विजेता अमर शहीद भागीरथ कड़वासरा के परिवार से।
नागौर जिले के कड़वासरा गांव में उस समय गर्व और भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब शहीद की बेटी सुष्मिता की शादी में भारतीय सेना ने पिता की जिम्मेदारी निभाई। यह केवल एक शादी समारोह नहीं था, बल्कि यह उस वादे की पूर्ति थी जो वर्षों पहले एक सैनिक ने अपने शहीद साथी से किया था।
बताया जाता है कि अमर शहीद भागीरथ कड़वासरा ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनके शौर्य और अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। उनके बलिदान के बाद परिवार की जिम्मेदारी पीछे छूट गई, लेकिन उनके साथियों ने उस जिम्मेदारी को अपना धर्म मान लिया।
सुष्मिता की शादी के अवसर पर भारतीय सेना की 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन के 24 जवान विशेष रूप से समारोह में शामिल होने पहुंचे। उनके साथ बटालियन के कमान अधिकारी कर्नल सोमेन्द्र कुमार सहित कई सैन्य और सेवानिवृत्त अधिकारी भी मौजूद रहे। जवानों की मौजूदगी ने पूरे समारोह को एक अलग ही गरिमा और गौरव प्रदान किया।
शादी की सभी रस्मों में सैनिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कहीं वे बारात की अगवानी करते दिखे, तो कहीं कन्यादान और अन्य परंपराओं में परिवार का संबल बने। उन्होंने केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज नहीं कराई, बल्कि हर जिम्मेदारी को अपने कर्तव्य की तरह निभाया। यह दृश्य देखकर गांव के लोग भी भावुक हो उठे।
सबसे मार्मिक क्षण वह था जब विदाई का समय आया। सुष्मिता की आंखों में आंसू थे, और वहां मौजूद कई जवानों की आंखें भी नम हो गईं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो एक पिता अपनी बेटी को विदा कर रहा हो। पूरा गांव इस दृश्य का साक्षी बना और हर किसी की आंखें श्रद्धा और सम्मान से भर आईं।
कर्नल सोमेन्द्र कुमार ने इस अवसर पर कहा कि सेना अपने किसी भी शहीद साथी के परिवार को अकेला नहीं छोड़ती। यह केवल एक औपचारिक संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक और नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले साथियों के बीच यह संकल्प लिया गया था कि यदि किसी पर विपत्ति आए, तो बाकी साथी उसके परिवार के साथ खड़े रहेंगे — और आज वही वादा निभाया गया।
इस घटना ने यह संदेश भी दिया कि भारतीय सेना केवल सीमा की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि अपने साथियों और उनके परिवारों के प्रति भी अटूट समर्पण रखती है। जब आज के दौर में कई रिश्ते जिम्मेदारियों से कतराते नजर आते हैं, तब यह उदाहरण समाज के लिए एक प्रेरणा बनकर सामने आया है।
नागौर की इस भावुक घटना ने पूरे देश को यह एहसास कराया कि शहीद कभी अकेला नहीं होता। उसके पीछे खड़ा होता है पूरा हिंदुस्तान। भारतीय सेना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वर्दी केवल कर्तव्य का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्मान, वचन और परिवार की भावना का भी प्रतीक है।
यह कहानी केवल एक शादी की नहीं, बल्कि उस अटूट बंधन की है जो सैनिकों को एक-दूसरे से और देश से जोड़ता है। शहीद से किया गया वादा शब्दों में नहीं, कर्मों में निभाया गया — और यही भारतीय सेना की असली पहचान है। 🇮🇳

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