ठेले पर शव और सिस्टम की संवेदनहीनता: बिहार में मानवता की करुण तस्वीर
बिहार से सामने आई एक दिल दहला देने वाली तस्वीर ने एक बार फिर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। एक युवक की मौत के बाद उसका शव एंबुलेंस के अभाव में ठेले पर ले जाया गया। इस दौरान मृतक की बेबस मां और परिजनों का रुदन, उनकी आंखों से बहते आंसू और व्यवस्था के सामने उठती मूक चीखें पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं। सवाल यह है कि क्या एक गरीब परिवार की पीड़ा इतनी कमजोर है कि वह सरकार और अफसरों के कानों तक नहीं पहुंच पाती?
घटना के अनुसार, युवक की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल और प्रशासन से एंबुलेंस की गुहार लगाई। बताया गया कि कई घंटों तक इंतजार करने के बावजूद कोई सहायता नहीं मिली। नतीजतन, मजबूरी में परिजनों को शव को ठेले पर रखकर ले जाना पड़ा। सड़क पर चलता वह ठेला सिर्फ एक शव नहीं ढो रहा था, बल्कि वह देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक असमानता का बोझ भी ढो रहा था।
मृतक का परिवार बेहद गरीब और बेसहारा बताया जा रहा है। परिवार का कहना है कि उनके पास न तो निजी वाहन का इंतजाम था और न ही शव वाहन के लिए पैसे। सरकारी अस्पताल में एंबुलेंस सेवा होने के बावजूद उसका लाभ उन्हें नहीं मिल सका। सवाल उठता है कि जब सरकार “108 एंबुलेंस सेवा” और “सबके लिए स्वास्थ्य” जैसे दावे करती है, तो फिर ऐसी घटनाएं क्यों बार-बार सामने आती हैं?
यह कोई पहली घटना नहीं है। बिहार ही नहीं, देश के कई हिस्सों से समय-समय पर ऐसी तस्वीरें सामने आती रही हैं, जहां मरीजों को ठेलों, खाटों या कंधों पर अस्पताल ले जाया गया या शवों को इस तरह ढोना पड़ा। हर बार प्रशासन जांच के आदेश देता है, जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बात होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने रहते हैं।
देश आज 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहा है। बड़े-बड़े मंचों से विकास, डिजिटल इंडिया और विश्वगुरु बनने की बातें की जाती हैं। लेकिन जब एक गरीब परिवार को अपने बेटे का शव सम्मान के साथ ले जाने के लिए एंबुलेंस तक नसीब न हो, तो इन दावों की सच्चाई कठघरे में खड़ी हो जाती है। विकास का मतलब सिर्फ आंकड़े नहीं होते, बल्कि यह भी होता है कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
इस घटना ने प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जरूरत इस बात की है कि केवल बयानबाजी और कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए जाएं। एंबुलेंस सेवाओं की उपलब्धता, जवाबदेही तय करना और दोषियों पर वास्तविक कार्रवाई ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोक सकती है।
बेबस महिला का वह रुदन सिर्फ अपने बेटे के लिए नहीं था, बल्कि वह पूरे सिस्टम से न्याय की गुहार थी। सवाल अब भी कायम है—क्या उसकी यह चीख कभी सरकार और अफसरों के कानों के पर्दे फाड़ पाएगी?
