अंधेरी रात, ठंड से कांपते बदन और सूनी आंखों में जमी
बेबसी… यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, झारखंड की उस कड़वी हकीकत की है जहाँ इंसानियत शर्मसार हो जाती है। जब जेब में पैसे नहीं थे, जब एम्बुलेंस सिर्फ नाम की सुविधा बनकर रह गई, तब एक मजबूर पिता ने अपने चार साल के मासूम बेटे के निर्जीव शरीर को थैले में डालकर कंधे पर उठाया और पैदल चल पड़ा। कोई गाड़ी नहीं, कोई मदद नहीं, कोई सवाल पूछने वाला नहीं… बस दर्द, लाचारी और एक बाप का टूटा हुआ दिल। जिस देश में हम चाँद पर पहुँचने की बातें करते हैं, उसी देश में एक पिता अपने बेटे को आख़िरी सफ़र पर यूँ ले जाने को मजबूर हो जाता है। यह तस्वीर सिर्फ एक शव की नहीं है, यह सिस्टम की नाकामी, समाज की बेरुखी और हमारी संवेदनहीनता का आईना है। सवाल ये नहीं कि गलती किसकी है, सवाल ये है कि क्या हम अब भी चुप रहेंगे? क्योंकि जब तक ऐसी तस्वीरें हमें झकझोरती नहीं, तब तक शायद अगला पिता भी अपने बच्चे को ऐसे ही उठाकर चलता रहेगा… और हम बस स्क्रॉल करते रहेंगे