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भगदड़ मामलों में दोहरा मापदंड? ‘पुष्पा 2’ केस में चार्जशीट, अन्य घटनाओं में कार्रवाई पर सवाल

हैदराबाद/नई दिल्ली:

देश में भीड़ और भगदड़ से जुड़ी घटनाओं में कानून की समानता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। तेलुगु सुपरस्टार अल्लू अर्जुन की फिल्म ‘पुष्पा 2’ के प्रीमियर के दौरान हुई भगदड़ मामले में हैदराबाद पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद, अन्य हाई-प्रोफाइल घटनाओं में कथित निष्क्रियता को लेकर बहस तेज हो गई है।

गौरतलब है कि 4 दिसंबर 2024 को हैदराबाद में ‘पुष्पा 2’ के प्रीमियर के दौरान भारी भीड़ उमड़ने से भगदड़ मच गई थी। इस घटना में एक महिला की मौत हो गई थी, जबकि उसका बेटा गंभीर रूप से घायल हो गया था। मामले में 13 दिसंबर 2024 को अभिनेता अल्लू अर्जुन को गिरफ्तार किया गया था, हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। अब, करीब एक साल बाद, हैदराबाद पुलिस ने इस मामले में अल्लू अर्जुन समेत 23 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है।

चयनात्मक कार्रवाई के आरोप

इस कार्रवाई के बाद सवाल उठ रहे हैं कि जब अभिनेता विजय की रैली के दौरान हुई भगदड़ और क्रिकेटर विराट कोहली को देखने उमड़ी भीड़ में लोगों की मौत के मामलों में कोई ठोस कानूनी कार्रवाई सामने नहीं आई, तो फिर ‘पुष्पा 2’ प्रीमियर केस में इतनी सख्ती क्यों?

सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि यदि भगदड़ में जान जाती है, तो जिम्मेदारी तय करना हर मामले में समान रूप से होना चाहिए। उनका आरोप है कि कानून का इस्तेमाल चुनिंदा मामलों में ही किया जा रहा है, जिससे न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

पुलिस का पक्ष

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ‘पुष्पा 2’ मामले में जांच के दौरान भीड़ प्रबंधन में गंभीर लापरवाही के सबूत मिले, जिसके आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई। पुलिस के अनुसार, हर घटना की जांच उसके तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होती है।

बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक फिल्म प्रीमियर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि क्या देश में भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक आयोजनों में जवाबदेही तय करने के लिए कोई समान और स्पष्ट नीति है? या फिर प्रभावशाली चेहरों और परिस्थितियों के हिसाब से कार्रवाई का स्तर बदल जाता है?

अब यह मामला अदालत के समक्ष है। आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया यह तय करेगी कि आरोपों की कानूनी परिणति क्या होती है, लेकिन फिलहाल यह बहस तेज हो चुकी है कि क्या कानून वास्तव में सबके लिए बराबर है।

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