महंगे नेटवर्क, खामोश उपभोक्ता
जून 2026 में निजी टेलीकॉम कंपनियों द्वारा टैरिफ बढ़ोतरी की घोषणा ने आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ा दी है। Airtel, Jio और Vodafone Idea (VI) — तीनों प्रमुख निजी कंपनियाँ अपने मोबाइल और डेटा प्लान्स की कीमतों में लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी की तैयारी में हैं। जानकारों के मुताबिक यह बढ़ोतरी यहीं नहीं रुकेगी, बल्कि आने वाले समय में इसमें और इज़ाफ़ा किया जा सकता है।
यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब देश में बेरोज़गारी दर ऊँची बनी हुई है, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है और वेतन में कोई ठोस बढ़ोतरी नहीं हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य, किराया और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बाद अब संचार सेवाएँ भी महंगी होने जा रही हैं, जबकि मोबाइल और इंटरनेट आज विलासिता नहीं बल्कि ज़रूरत बन चुके हैं।
टेलीकॉम कंपनियाँ तर्क देती हैं कि नेटवर्क विस्तार, 5G निवेश और बढ़ती लागत के कारण टैरिफ बढ़ाना ज़रूरी है। लेकिन सवाल यह है कि इसका पूरा बोझ केवल उपभोक्ता पर ही क्यों डाला जाए? बीते वर्षों में इन कंपनियों ने करोड़ों का मुनाफ़ा भी कमाया है, फिर भी राहत देने के बजाय कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश का उपभोक्ता इस पर आवाज़ क्यों नहीं उठाता। क्या वजह है कि हर बढ़ोतरी को चुपचाप स्वीकार कर लिया जाता है? न सड़कों पर विरोध दिखता है, न उपभोक्ता संगठनों की मज़बूत पहल। डिजिटल निर्भरता इतनी बढ़ चुकी है कि लोगों के पास विकल्प भी सीमित हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आज सवाल नहीं उठाए गए, तो भविष्य में टैरिफ और महंगे होंगे। उपभोक्ता की चुप्पी कंपनियों के लिए सहमति बन जाती है। ज़रूरत है जागरूकता, संगठित विरोध और जवाबदेही की—ताकि संचार जैसी बुनियादी सेवा आम आदमी की पहुँच से बाहर न हो जाए।
