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गांव कर्णवास में मनाया शौर्य दिवस

युवा मंगल दल अध्यक्ष सौरभ कुमार ने बताया कि शौर्य दिवस एक इतिहास का दिन इस दिन युद्ध: यह लड़ाई तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का हिस्सा थी, जो पुणे के पास भीमा नदी के किनारे कोरेगांव में लड़ी गई थी सेनाएँ: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री की दूसरी बटालियन (जिसमें लगभग 500 महार सैनिक और अन्य समुदायों के सैनिक शामिल थे) ने पेशवा बाजीराव  की विशाल सेना (लगभग 28,000 सैनिक) का सामना किया परिणाम: संख्या में बहुत कम होने के बावजूद, महार सैनिकों के अदम्य साहस के कारण ब्रिटिश सेना ने पेशवा की फौज को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस जीत ने भारत में पेशवा शासन के अंत और ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई शौर्य दिवस और विजय स्तंभ: विजय स्तंभ: इस युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में अंग्रेजों ने कोरेगांव में एक विजय स्तंभ बनवाया। इस स्तंभ पर शहीद हुए 49 सैनिकों के नाम अंकित हैं, जिनमें से 22 महार सैनिक थे डॉ. बी.आर. अंबेडकर का प्रभाव: 1 जनवरी 1927 को डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने इस विजय स्तंभ का दौरा किया था। उन्होंने इस युद्ध को जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव के खिलाफ दलितों की जीत के प्रतीक के रूप में पहचाना, जिसके बाद से यह दिन प्रतिवर्ष ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा वर्तमान महत्व: आज 1 जनवरी 2026 को इस ऐतिहासिक जीत की 208वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। हर साल लाखों लोग इस दिन विजय स्तंभ पर श्रद्धांजलि अर्पित करने और आत्मसम्मान का उत्सव मनाने के लिए एकत्रित होते हैं यह दिन न केवल एक सैन्य जीत की याद दिलाता है, बल्कि यह अन्याय और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध प्रतिरोध का एक शक्तिशाली प्रतीक भी बन गया है

मौजूद रहे लोग

सौरभ कुमार

राम सिंह

कुदीप कुमार

विनोद कुमार डॉ पंकज कुमार  दिनेश कुमार गौतम Dk bhai

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